श्रीरामचरित्रमानस बालकांड – सीताराम जी की अर्थसहित सम्पूर्ण कथा (प्रथम सोपान )

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श्रीरामचारीरमानस
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बालकांड-प्रथम सोपान:

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1. भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरता गरल सरहिअ मीचु।

भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किये रहता हैं। अमृत की सराहना अम्र करने में होते है और विष की मरने में।

2. खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।
तेहि ते कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।

दुष्टों पापो और अवगुणों की और साधुओं की और साधुओं के गुणों की कथाएँ- दोनों ही अपर और अथाह समुन्द्र हैं। इसी से कुछ गुन और दोषो का वर्णन किया गया है, क्योकि बिना पहचाने उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता।

3. भलेउ पॉच सब बिधि उपजाय। गनि गुन दोष बेद बिलगाए।
कहहि बेद इतिहास पुराना। बिधि पपंचु गुन अवगुन साना।

भले, बुरे सभी ब्रह्मा के पैदा किये हुए हैं, पर गुन और दोषो को विचारकर वेदो ने उनको अलग-अलग क्र दिया हैं। वेद, इतिहास और पुराण कहते है कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुन-अवगुणो से सनी हुई है।

4. दुःख सुख पाप पुन्य दिन राति। साधु असाधु सुजाति कुजाति।
दांव देव उच्च अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु महरू मीचू।
माया ब्रह्मा जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा।
कासी मग सुरसरि करमनासा। मरू मारव महिदेव गवासा।
सरग नरक अनुरागा बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।

दुःख-सुख, पाप-पुन्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊंच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन-मृत्यु, माया-ब्रह्मा, जीव-ईश्वर, सम्पति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गंगा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य वेद-शास्त्रों ने उनके गुन-दोषो का विभाग कर दिया हैं।

5. जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहीं पय परिहरि बारी बिकार।

विधटने इस जड़-चेतन विश्व की गुण-दोषमय रचा है; किंतु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूध को ही ग्रहण करते है।

6. अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहि मनु राता।
काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बीएस चुकइ भलाई।

विधाता जब इस प्रकार का विवेक देते हैं, तब दोषो को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता हैं। कल-स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं।

7. सो सुधरी हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुःख दोष बिमल जसु देहीं।
खलउ करहीं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगु।

भगवन के भक्त जैसे उस चूक को सुधर लेते है और दुःख-दोषो को मिटाकर निर्मल यश देते है, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उतम संग पाकर भलाई करते है; परन्तु उनका कभी भांग न होने वाला मलिन स्वाभाव नहीं मिटता।

8. लखि सुबेष जग बंचक जेउ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।
उघरहि अंत न होइ निबाहु। कालनेमि जिमि रावन राहु।

जो ठग हैं, उन्हें भी अच्छा वेष बनाये देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है; परंतु एक-न-एक दिन वे चौड़े आ ही जाते है; अंततक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमी, रावण और राहुका हाल हुआ।

9. किएहुँ किबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।

बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत में जांबवान और हनुमानजी का हुआ। बुरे संग से हानि और अचे संग से लाभ होता है, यह बात लोक और वेदो में है और सभी लोग इसको जानते है।

10. गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहि मिलइ नीच जल संगा।
साधु असाधु सदन सुख सारी। सुमिरहीं राम देहीं गनि गारी।

पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वहीं नीच जल के संग से किचड़ में मिल जाती हैं। साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरत हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते है।

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