श्रीरामचरित्रमानस बालकांड -प्रथम सोपान

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बालकांड:

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1. सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।
बिधि बस सुजन कुसंगत परही। फनि मणि सम निज सुन अनुसरहीं।

दुष्ट भी सतसंगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पर्स के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है। किन्तु दैवयोग से यदि कबि सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे संसर्ग पाकर भी मणि उसके समान अपने गुणों का ही अनुसरण करे है। संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथ अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दुसरो को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

2. बिधि हरी हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी।
सो मो सन कही जात न कैसे। साक बनिक मनि गन गन जैसे।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवी और पंडितो की वाणी भी संत-महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकरी बचने वाले से मणियों के गुणसमूह नहीं कहे जा सकते।

3. बबंदउँ संत समान चित हिट अनहित नहीं कोई।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध क्र दोई।

मैं संतो को प्रणाम करता हूँ, जिनके चित में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न कोई शत्रु। जैसे अञ्जलि में रखे हुए सुंदर फूल दोनों ही हाथो को समानरूप से सुगन्धित करते है।

4. संत सरल चित जगत हित जानी सुभाउ सनेहु।
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु।

संत सरलह्दय और जगत के हितकारी होते है, उनके ऐसे स्वभाव और स्नहेको जानकर मैं विनय करता हूँ, मेरी इस बल-विनय को सुनकर कृपा करके श्रीरामजी के चरणों में मुझे प्रीति दे।

5. बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरे। उजरे हरष बिषाद बसेरे।

अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते है। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी द्र्ष्टि में लैह है, जिनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है।

6. हरी हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से।
जे पर दोष लखहि सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी।

जो हरि और हर के यशरूपी पूर्णिमा के चन्द्रमा के लिये राहुल के समान हैं और दूसरों की बुराई करने में सहस्त्रबाहु के समान वीर हैं। जो दूसरों के दोषो को हजार आँखों से देखते है और दूसरों के हितरूपी घी के लिये जिनका मन मखी के समान है। (अर्थातः जिस प्रकार मखी घी में गिरकर उसे खराब क्र देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरों के बने-बनाये काम को अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं।)

7. तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा।
उदय केत सम हित सबहि के। कुंभकरन सम सोवत नीके।

जो तेज में अग्नि और क्रोध में यमराज के समान है, पाप और अवगुण रूपी धन कुबेर के समान धनी है, जिनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के लिये केतु के समान है, और जिनके कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई है।

8. पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरही।
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा।

जैसे ओले खेती का नाश करके आप भी गल जाते है, वैसे ही वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिये अपना शरीर तक छोड़ देते हैं। मै दुष्टों को शेष जी के समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराये दोषो का हजार मुखों से बड़े रोष के साथ वर्णन करते है।

9. पुनि प्रनवउँ समाना। पर अघ सुनइ दस काना।
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही।

पुनः उनको राजा पृथु के समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जो दस हजार कानों से दूसरों के पापो को सुनते है। फिर इंद्र के समान मानकर उनकी विनय करता हूँ, जिनको सुरा नीकी और हितकारी मालूम देती है।

10. बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा।

जिनको कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्यारा लगता है और जो हजार आँखों से दूसरों के दोषो को देखते हैं।

11. उदासीन आरी मीत हित सुनत जरहि खल रीती।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।

दुष्टों की यह रीती है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र, किसी का भी हित सुनकर जलते हैं। यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह जन प्रेमपूर्वक उनसे विनय करताहै।

12. मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।
बाय्स पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ की कागा।

मैंने अपनी ओरसे विनती की है, परंतु वे अपनी ओरसे कभी नहीं चूकेंगे। कौओ को बड़े प्रेम से पालिये, परंतु वे क्या कभी मांस के त्यागी हो सकते हैं?

13. बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुःख दारुन देहीं।

अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वंदना करता हूँ; दोनों ही दुःख देने वाले है; परंतु ुमे कुछ अंतर कहा गया है। वह अंतर यह है कि एक संत तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे असंत मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं।

14. उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।
सुधा सुरा सम साधु असाधु। जनक एक जग जलधि अगाधू।

दोनों जगत में एक साथ पैदा होते है; पर कमल और जोंक तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। साधु अमृत के समान और असाधु मदिरा के समान हैं, दोनों को उतपन करने वाला जगतरूपी अगाध समुद्र एक ही हैं।

15. भल अनभल निज निज करतूती। लहत सूजस अपलोक बिभूती।
सुधा सुधाकर सुरसरि साधु। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू।
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव निक तेहि सोई।

भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुंदर यश और अपयश की सम्पति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गंगाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुग के पापो की नदी अर्थातः कर्मनाशा और हिंसा करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते है; किंतु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता हैं।

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