Pureshwar Mahadev Temple – सावन की कावड़ यात्रा का महत्व जुड़ा है इस मंदिर से

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Pureshwar Mahadev
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Pureshwar Mahadev Temple, Haridwar, Uttarakhand, India

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ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम दिग्विजय (पूरी पृथ्वी को जीतने के बाद) होने के बाद जब मयराष्ट्र (वर्तमान में मेरठ) से होकर निकले तो उन्होंने पुरा नामक स्थान पर विश्राम किया और वह स्थल उनको अत्यंत मनमोहक लगा। उन्होंने वहाँ पर Sihv (Pureshwar Mahadev) Temple बनवाने का संकल्प लिया। इस temple में शिवलिंग की स्थापना करने के लिए पत्थर लाने वह हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे। उन्होंने मां गंगा की आराधना की और मंतव्य बताते हुए उनसे एक पत्थर प्रदान करने का अनुरोध किया।

यह अनुरोध सुनकर पत्थर रोने लगे, क्योंकि वे देवी गंगा से अलग नहीं होना चाहते थे। तब भगवान परशुराम ने उनसे कहा कि जो भी पत्थर वह लेकर जाएंगे, उसका चिरकाल तक गंगा जल से Pureshwar Mahadev के रूप में अभिषेक किया जाएगा। हरिद्वार के गंगा तट से भगवान परशुराम पत्थर लेकर आए और उसे शिवलिंग के रूप में Pureshwar Mahadev Temple में स्थापित किया।

ऐसी कहा जाता है कि जब से भगवान परशुराम ने हरिद्वार से पत्थर लाकर उसका शिवलिंग Pureshwar Mahadev Temple में स्थापित किया तब से कावड़ यात्रा की शुरूआत हुई। इसी मान्यता के कारण शिवभक्त कावडिये मुश्किल से मुश्किल कष्टों को सहते हुए भी हरिद्वार से गंगाजल लाकर Pureshwar Mahadev Temple में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। श्रावण मास में यहां कावड़ियों का सैलाब उमड़ता है, जो की देख़ने लायक द्रश्य होता हैं।

कावड़ यात्रा के नियम एवं शर्ते

ऐसा माना जाता है की सावन का month भगवान Shiv की पूजा के लिए अति श्रेस्ठ month है। इस month में जिसने भी सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करली उसे शिव जी की कृपा जल्दी ही प्राप्त होती है। सावन के Month में कावड़ लाना भी सर्वश्रेस्ठ माना जाता है। सावन के Month में कावड़ इसलिए लाया जाता है ताकि Shiv Ji का पवित्र जल से जलाभिषेक किया जा सके। कावड़ लाने का एक विषेश महत्व ओर यह है की व्यक्ति के विश्वास को भगवान के प्रति बढ़ाया जा सके। कावड़ लाने के कयी सारे फायदे है, जैसे व्यक्ति का संकल्प लेने की शक्ति का विकास होता है, द्रढ़ निश्चयि होता है, अपनी क्षमताओं को पहचान सकता है।

यही reason है सावन के month में कावड़ लाने का, की जिससे लोग भगवन की भक्ति की तरह आकर्षित हो और उसे आगे बढ़ाये। ये लोग उस पवित्र जल से भगवान Shiv का जलाभिषेक करते है। इस यात्रा के लिए कुछ नियम भी बनाये गए है, जो की इस प्रकार है:

1. इस यात्रा के दौरान आप न तो नशा कर सकते है, न ही आप मांस मदिरा का सेवन नहीं कर सकते है।

2. स्नान करने बाद ही कावड़ को छुआ जा सकता। तेल, साबुन, कंघी व अन्य श्रृंगार सामग्री का उपयोग भी कावड़ यात्रा के दौरान नहीं किया जाता। अगर यात्रा लंबी होती है तो यात्री अपनी कावड़ या तो दूसरे कावड़ यात्री को दे सकते है या फिर थोड़ी देर विश्राम करने उस उस कावड़ को किसी पेड पर रख सकते है, लेकिन ये ध्यान रखना होगा की कावड़ धरती को न छुए।

3. कावड़ यात्रियों के लिए चारपाई पर बैठना एवं किसी भी वाहन पर चढऩा भी निषेध है, हाँ, आप आप वाहन चढ़ सकते हो लेकिन एक ही condition में की आप अपनी कावड़ किसी दूसरे कावड़ यात्री को दे या फिर अपने साथ के किसी relative को। चमड़े से बनी वस्तु का स्पर्श एवं रास्ते में किसी वृक्ष या पौधे के नीचे कावड़ रखने की भी मनाही है।

4. कावड़ यात्रा में बोल बम-ताड़क बम एवं जय-जय शिव-शंकर घोष का उच्चारण करना तथा कावड़ को सिर के ऊपर से लेने तथा जहाँ कावड़ रखी हो उसके आगे बगैर कावड़ के नहीं जाने के नियम पालनीय होती हैं।

इस तरह इन कठिन नियमों का पालन कर कावड़ यात्री अपनी यात्रा पूरी करते हैं। इन नियमों का पालन करने से मन में विश्वास रूपी शक्ति का जन्म होता है।

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