प्रेतयोनि से पाई मुक्ति – Motivational Story

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प्रेतयोनि से पाई मुक्ति - Motivational Story
प्रेतयोनि से पाई मुक्ति - Motivational Story
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किसी समय दक्षिण दिशा में तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित एक नगर में आत्मदेव नाम का एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम था- धुंधुली। ब्राह्मण जितना विन्रम और सदाचारी था, उसकी पत्नी उतनी ही दुष्ट स्वभाव की थी। वह बेहद ईर्ष्यालु और कर्कश थी। हमेशा अपनी पति की अवज्ञा करती थी। उसका एक कारण शायद यह भी था कि अधेड़ अवस्था हो जाने पर भी उसे कोई संतान नहीं हुई थी। एक दिन दोनों के बीच बहुत झगड़ा हुआ,जिसके कारण आत्मदेव दुखी मन से अपना जीवन समाप्त करने के इरादे से घर से निकलकर वन की ओऱ चल पड़ा। उसके मन में अनेक प्रकार के कुविचार उठ रहे थे। वह सोच रहा था कि मैंने कितना जप-तप किया, कितने तीर्थो की खाक छानी, किन्तु कुछ भी तो नहीं मिला। मेरे मन की मुराद पूरी न हुई। अब मैं जिकर क्या करूंगा। समाज और स्वयं अपनी पत्नी के संतान उतपन्न न कर पाने की उलाहने सुन-सुनकर मेरा कलेजा फट जाता है। ऐसे जीवन को धिक्कार हैं। अब तो मेरा मर जाना ही श्रेयष्कर रहेगा।

यही विचारकर ब्राह्मण जंगल में एक विशाल सरोवर के पास पहुंचा। उसका इरादा हुआ कि इसी सरोवर के गहरे जल में कूदकर अपनी जिंदगी समाप्त कर ले, किन्तु फिर जैसे उसकी अंतरात्मा ने उसे जाग्रत किया। वह सोचने लगा- शास्त्रों में कहा गया है कि आत्महत्या करना महापाप होता है। ईश्वर द्वारा दिए गए इस अनमोल जीवन को यूं ही समाप्त कर देना पाप होगा। मुझे धीरज से काम लेना चाहिए। ब्राह्मण सरोवर के किनारे बैठ गया और उदास भाव से सरोवर मेँ उठती लहरों को देखने लगा। तभी एक महात्मा वहां पहुंचे। महात्मा को देखकर आत्मदेव ने उन्हें प्रणाम किया और उनके पैर छुए। महात्मा ने ब्राह्मण को आशीर्वाद दिया और उसके उदास चेहरे पर निगाह डालकर पूछा, “क्या बात है वत्स? तुम बहुत उदास दिख रहे हो।”

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“हां मुनिवर। मैं इस कलंकित जीवन से तंग आ चुका हूं और इसे समाप्त करने का निश्चय करके ही यहां आया हूं।” आत्मदेव ने बताया।

“आत्महत्या एक महान पाप है, वत्स।” महात्मा बोले, “तुम मुझे अपना दुःख बताओ। हो सकता है मैं ही तुम्हारे दुख का निवारण कर दूं।”

“मुनिवर।” ब्राह्मण बोले, “वर्षो की साधना के बाद भी मुझे पुत्र-प्राप्ति का सुख नहीं मिला, सब लोग मुझे निर्वशी कहकर मेरा अपमान करते हैं।

“हुम्म! जरा अपना दायां हाथ तो दिखाओ। देखूं तुम्हारी हस्तरेखाएं क्या बताती हैं।”

ब्राह्मण ने तत्काल अपना दायां हाथ आगे बढ़ा दिया। महात्मा ने गौर से उसके हाथ की रेखाएं पढ़ी। फिर वह बोले, “पुत्र-प्राप्ति का योग तुम्हारे भाग्य में नहीं है, वत्स। इसलिए इस व्यर्थ की चिंता को छोड़कर अपना शेष जीवन भगवान के भजन में लगाओ।”

यह सुनकर ब्राह्मण ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “हे महामुने। मैंने तो सुना है की योगीजन अंसभव को भी संभव बनाने की क्षमता रखते हैं। उनके मुख से निकला वाक्य ब्रहावाक्य होता है। हे मुनिश्रेष्ठ। क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मेरे निसंतान होने का कलंक दूर हो जाए?”

महात्मा को आत्मदेव पर दया आ गई। उनका मन पसीज उठा। अपने थैले में से एक फल निकाला और आत्मदेव को देकर बोले, “तुम्हे पुत्र-प्राप्ति की ज्यादा ही चाह है तो यह फल ले जाओ। जाकर अपनी पत्नी को खिला देना। ईश्वर ने चाहा तो जल्दी ही तुम्हारे यहां संतान पैदा हो जाएगी।”

ब्राह्मण ने झुकार महात्मा के फिर से चरण छुए और ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौट पड़ा। घर पहुंचकर उसने वह फल अपनी पत्नी को देते हुए कहा, “देवी! इस फल को खा लो। यह एक महात्मा का दिया हुआ प्रसाद है। ईश्वर ने चाहा तो जल्दी ही तुम मां बन जाओगी।” धुंधुली ने फल ले लिया और नहा-धोकर फल खा लेने को कहकर अपने पति को संतुष्ट कर दिया।

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आत्मदेव के जाने के बाद धुंधुली मन में विचार करने लगी की पहले जरा अपनी बहन से यह पूूछ लूं कि प्रसवकाल में स्त्री को कितना कष्ट होता हैं। धुंधुली की छोटी बहन उन दिनों उससे मिलने के लिए उसके यहां आई हुई थी। वह अपनी बहन से मिली। बोली, “बहन। मेरे पति ने संतान प्राप्त होने के लिए एक फल लाकर दिया है। मैं तुमसे यह पूछना चाहती हूं कि क्या प्रसव के समय स्त्री को बहुत कष्ट होता है।”

“यह मत पूछो बहन। “धुंधुली की बहन बोली, “इतना कष्ट होता है की स्त्री पीड़ा से अधमरी हो जाती है। प्रसव के पश्चात तो स्त्री का दूसरा जन्म हुआ ही समझो।”

“फिर तो मैं उस फल को कभी नहीं खाउंगी।” धुन्धुली ने भयभीत होकर कहा, “बच्चा हुआ तो मैं तो कष्ट से मर ही जाऊंगी। मेरा सारा यौवन ढल जाएगा। मैं असमय ही बूढी लगने लगूंगी।”

“तुम ठीक सोचती हो बहन।” धुंंधुली की बहन ने कहा, “जरा सोचो तो, यदि तुम्हारा यौवन निस्तेज हो गया तो तुम्हारे पतिदेव तुम्हे छोड़कर दूसरी स्त्रियों में दिलचस्पी लेने लगेंगे। तब तुम्हारा क्या होगा?”

“अब मैं क्या करूं बहन? क्या उस फल को नष्ट कर दूं?”

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“नष्ट करने की आवश्यकता क्या है। तुम उसे अपनी गाय को खिला दो। तुम्हारे पतिदेव पूछें तो उन्हें बता देना की तुमने फल खा लिया है।” धुन्धुली की बहन ने कहा।

“लेकिन जब समय पूरा होगा और मुझे कोई बच्चा न हुआ तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगी?” धुंंधुली अभी भी हिचकिचाहट महसूस कर रही थी।

“उसका उपाय मैं तुम्हे सुझा देती हूं।” धुन्धुली की बहन बोली, “मैं इस समय एक महीने के गर्भ से हूं। जब मेरे गर्भ से शिशु जन्म लेगा तो मैं उस बच्चे को तुम्हे दे दूंगी।”

“और यदि इस दौरान मेरे पति ने मेरे सामान्य पेट को देखकर शंका की तो।” धुंधली ने आशंका व्यक्त की।

“तुम अपने पेट पर पट्टियां और रुई आदि बांधकर उसे मोटा होने का दिखावा करती रहो।”
धुंधुली की बहन ने इसका भी समाधान सुझाया, “उचित समय पर जब मेरा बच्चा हो जाएगा, तो उसे लेकर प्रचारित कर देना की यह बच्चा मेरे पेट से ही पैदा हुआ है।” बहन की बात मानकर धुंधुली ने वह फाल उसी दिन अपनी गाय को खिला दिया और अपनी बहन को निकट के एक मकान में ठहरा दिया। फिर निर्धारित समय पर जब उसकी बहन को बालक पैदा हो गया तो उस बालक को अपने पास बिस्तर पर लिटा लिया और आत्मदेव को कह दिया की उसे पुत्र पैदा हुआ है।

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पुत्र-प्राप्ति का समाचार सुनकर ब्राह्मण बहुत खुश हुआ। उसने-गरीबों और ब्राह्मणों को बहुत-सा दान दिया और नगरवासियों को एक बहुत बड़ा भोज दिया। आत्मदेव ने अपने उस पुत्र का नाम धुंधकारी। कुछ दिन पश्चात ब्राह्मण की गाय को भी एक पुत्र पैदा हुआ। उस बालक की विशेषता यह थी की उसके कान तो गाय जैसे थे, शेष सारा शरीर मानव जैसा था। आत्मदेव ने उस बालक का नाम रखा-गोकर्ण। आत्मदेव अपने पुत्र की भांति ही उस बालक की परवरिश भी करने लगा। धुंधुली की बहन आत्मदेव की अनुपस्थिति में चोरी-छिपे उसके घर आती और धुंधकारी को अपना दूध पिला जाती। धुंधकारी ज्यो -ज्यो बड़ा होता गया उसकी आदते बिगड़ती चली गई। मां के लाड-प्यार में पलकर वह दिनों-दिन ढीठ व जिददी होता चला गया। कभी किसी बच्चे को पिट देता तो किसी के पशुओं को खोल आता। पड़ोसी शिकायत करने पहुंचते तो धुंंधुली उनके नुकसान की भरपाई कर देती। ओऱ गोकर्ण नियमित रूप से पाठशाला जाता और खूब मन लगाकर पढ़ता। उसके गुरुजन उससे प्रसन्न रहते थे। घर लौटकर वह आत्मदेव को भी भरपूर सेवा करता था। धुंधुली उसे अकारण ही डांटती रहती थी किन्तु वह हंसकर उसकी हर बात को बर्दाश्त कर लेता था।

फिर एक दिन वह भी आया जब धुंधकारी एक चोर और उठाईगीर बन गया। घर की चीजे बेच-बेचकर वह वेश्याओं के कोठों पर जाने लगा। और एक दिन तो हद ही हो गई। मां के धन न देने पर उसने धुंधली को इतना पिटा की उसकी मृत्यु ही हो गई।

उसी शाम गोकर्ण और आत्मदेव ने आपस में विचार-विमर्श किया, “पुत्र गोकर्ण। अब इस घर से मेरा मन उचाट हो गया है। मैं बाकि समय वन में जाकर भगवत भजन में लगाना चाहता हूं।”

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“मैं भी किसी तीर्थ में जाकर अपना मन शुद्ध करना चाहता हूं, किसी सद्गुरु की शरण में जाकर उनसे ब्राहाज्ञान प्राप्त करूंगा। मार्ग में आपको वन में भी छोड़ता जाऊंगा।”

गोकर्ण अपने पिता को वन में छोड़कर कशी की और निकल गया।

उधर, मां के मरने और पिता तथा भाई द्वारा घर छोड़ देने के पश्चात धुंधकारी बिलकुल ही आजाद हो गया। उसे कोई टोकने वाला न रहा तो उसने बेखौफ होकर वेश्याओं पर धन लुटाना आरंभ कर दिया। पास धन रहा, वेश्यांएं उसका मनोरंजन करती रही, लेकिन जब धन समाप्त हो गया तो वेश्याओं ने उसकी उपेक्षा करनी शुरू कर दी। उनके बदले व्यवहार से तंग आकर एक दिन धुंधकारी ने उनसे पूछ ही लिया, “क्या बात है, अब तुम्हारे व्यवहार मे न तो पहले जैसा उत्साह है और न गर्मजोशी। यह परिवर्तन किसलिए? क्या इसलिए की अब मेरे पास धन नहीं रहा?”

“तुम ठीक समझे हो धुंधकारी।” वेश्याएं बोली, “अब तुम हमरे पास मत आया करो। धनहीन व्यक्ति को हमरे धंधे में कोई पूछ नहीं है। जब तुम्हारे पास धन हो जाए तो बखुशी यहां आ जाना। हम पहले की तरह ही तुम्हारे मनोरंजन के लिए तैयार रहेंगी।”

वेश्याओं के उत्तर सुनकर धुंधकारी को बड़ी ठेस लगी, लेकिन उसने इसका भी प्रबंध कर लिया। वह चोरी करने लगा। और चुराए हुए धन को वेश्याओं पर खर्च करने लगा। एक दिन तो हद ही हो गई। वह चार-पांच वेश्याओं को अपने घर ले आया। वेश्याओं ने उसे खूब मदिरा पिलाई और जब वह मदिरा पीकर बेहोश हो गया तो उन्होंने आपस में मिलकर विचार-विमर्श किया, “बहन! यह आदमी तो अब हमारे लिए मुसीबत बनता जा रहा है। यह चोरी करने लगा है। किसी दिन पकड़ा गया तो हमें भी मुसीबत में डाल देगा। इससे पीछा छुड़ाने का कोई उपाय सोचो।” एक वेश्या ने कहा।

“उपाय तो यही है कि इसकी हमेशा के लिए छुट्टी कर दी जाए।” दूसरी वेश्या बोली, “इस समय यह बेहोश है। इसका गला दबाकर मार डालो और इसकी लाश घर के इसी आंगन में गाड़ दो। किसी को खबर तक न मिलेगी और इससे हमेशा के लिए हमे छुटकारा भी मिल जाएगा।”

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दूसरी वेश्या के सुझाव का सभी ने अनुमोदन किया। उन्होंने गला दबाकर धुंधकारी को मार डाला और एक गहरा गड्ढा खोदकर आंगन में ही उसके शव को गाड़ दिया। फिर वे उसके घर से जो भी मूल्यवान सामान मिला, उसे लेकर चंपत हो गई। धुंधकारी मर कर भयानक प्रेत बन गया और उसी मकान में मकान में रहकर विचरण करने लगा। वेश्याओं ने प्रचारित कर दिया था की धुंधकारी व्यापार करने के लिए विदेश चला गया हैं। सभी ने उनकी बात पर विश्वास कर लिया। वैसे भी उस जैसे दुराचारी का कोई मित्र या सगा-संबंधी तो था नहीं, जो उसके लिए चिंता करता। पड़ोसियों को तो उसके जाने से उलटे राहत ही मिली।

कुछ दिन पश्चात काशी से अपनी शिक्षा पूरी करके गोकर्ण घर लौटा। रात में जब वह सो रहा था तो घर में अनेक प्रकार के उपद्रव होने लगे। उसे महसूस होने लगा जैसे घर में कोई प्रेत घुस आया है, जो कभी तो कुत्ते की तरह जोर-जोर से रोने लगता है और कभी हाथी जैसी आवाज में भयानक चिघाड़ें मरता है। यह देखकर वह अपने बिस्तर से उठ बैठा। उसने देखा कि उससे कुछ ही फासले पर एक महाभयानक प्रेत बैठा हुआ है और उसकी द्रष्टि गोकर्ण पर ही टिकी हुई है। गोकर्ण ने अपने कमंडलु से जल लेकर मंत्र पढ़कर उस पर छिड़का तो प्रेत शांत हुआ और एक ओऱ को सिकुड़कर बैठ गया। गोकर्ण ने उससे पूछा, “तुम कौन हो भाई, और इस प्रेत योनि में क्यों भटक रहे हो?”

इस पर प्रेत ने अपना परिचय दिया और गिड़गिड़ाकर कहा, “मुझे इस प्रेतयोनि से मुक्ति दिलाओ भैया। मैं बेहद कष्ट भोग रहा हूं। मरकर भी मेरी आत्मा को शांति नहीं मिली। मैं अब और ज्यादा कष्ट सहन नहीं कर सकता।” यह सुनकर गोकर्ण ने उसे आश्वासन दिया। कहा, “अब तुम्हे चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, भैया। मैं कल ही गया जी चला जाऊंगा। वहां तुम्हारे पिंडदान कर दूंगा जिससे तुम्हे प्रेतयोनि से मुक्ति मिल जाएगी।”

अगले ही दिन गोकर्ण गया के लिए रवाना हो गया। वहां उसने विधिवत धुंधकारी का तर्पण किया और उसकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। जब वह वापिस लौटा तो उसने पुन: धुंधकारी को प्रेतयोनि में ही भटकता पाया। इस पर गोकर्ण को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने धुंधकारी के प्रेत से पूछा, “भैया, मैंने तो गया में विधिवत तुम्हारा पिंडदान और श्राद्ध कर दिया था, लेकिन तुम्हारी मुक्ति तो फिर भी नहीं हुई।”

“मैं घोर पटकी प्रेत हूं भैया।” धुंधकारी के प्रेत ने कहा, मेरी मुक्ति साधारण उपायों से नहीं होने वाली। जब तक तुम कोई ठोस उपाय नहीं करोगे, मैं इसी प्रकार इस योनि में भटकता रहूंगा।

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अगले ही दिन गोकर्ण अनेक विद्वानों और पंडितो से सलाह ली और उनसे धुंधकारी की मुक्ति का उपाय पूछा तो पंडितों ने कहा, “गोकर्ण। तुम सूर्य भगवान की आराधना करो। यदि वे तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हुए और उसके सामने प्रकट हो गए। कहा, “मैं तुम्हारी पूजा-आराधना से प्रसन्न हूं वत्स मांगो, क्या वर मांगते हो?”

“हे देव! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे भाई की मुक्ति का उपाय बता दीजिए। उसका कष्ट मुझसे सहन नहीं हो पा रहा।” गोकर्ण विनीत स्वर में कहा।

“उसका तो एक ही उपाय है।” सूर्यदेव बोले, “यदि कोई सद्विचारों वाला प्रभुभक्त, एक हफ्ते तक तुम्हारे भाई के प्रेत को श्रीमदभागवत की कथा सुनाए, और वह शांत होकर कथा का श्रवण कर ले, तो उसे प्रेतयोनि से मुक्ति मिल जाएगी।”

“तब मैं स्वंय उसे श्रीहरि की कथा सुनाऊंगा, देव। लेकिन मेरी एक शंका भी है। वह यह कि वह एक प्रेत है, साधारण मानवों की तरह तो मेरे सामने बैठकर कथा नहीं सुन सकता।”

“उसका भी एक उपाय है।” सूर्यदेव बोले, “तुम कथा स्थल पर एक सात गांठ वाला बांस गाड देना। प्रेत उस बांस की अंतिम गांठ पर सूक्ष्म रूप में आकर बैठ जाएगा। फिर ज्यो-ज्यों कथा समाप्त होती जाएगी, बांस की गांठे चटक-चटक कर फटती जाएंगी। अंतिम गांठ जैसे ही फटेगी, वह प्रेत इस योनि से मुक्त हो जाएगा।

गोकर्ण वैसा ही किया। श्रीमदभागवत की कथा का आयोजन किया। प्रेत सात गांठ वाले बांस के ऊपरी सिरे पर आ बैठा। ज्यों-ज्यों कथा आगे बढ़ती गई, बांस की गांठे फटती गई। और जब सातवें दिन कथा का समापन हुआ तो अंतिम गांठ भी फट गई और उसमे से दिव्य पुरुष के रूप में धुंधकारी प्रकट हो गया। तभी एक दिव्य विमान स्वर्ग से वहां पहुंचा और देवदूतों ने धुंधकारी को उस विमान में बैठा लिया और उसे देवलोक ले गए। जो भी व्यक्ति श्रीमदभागवत कथा का सच्चे मन से श्रवण करता है, उसे अंतत: स्वर्ग में ही स्थान मिलता है।

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