श्री रामचरित्रमानस का महत्व एवं इसका हिंदी सार

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Ramcharitrmans
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यह तो हम सभी जानते है की श्रीरामचरितमानस की रचना तुअलसीदास जी ने की थी। श्रीरामचरिमानस का स्थान हिंदी साहित्य में ही नहीं बल्कि पूरे जगत के साहित्य में निराला हैं। रामचरितमानस एक आशीर्वादात्मक ग्रन्थ हैं। इसका प्रत्येक श्रद्धालु लोग मन्त्रवत आदर करते हैं। इसके पाठ से लौकिक एवं पारमार्थिक अनेक कार्य सिद्ध हो जाते हैं। रामचरित्रमानस की शुरुआत बालकाण्ड अधाय्य से होती हैं।

रामायण का बालकाण्ड:

1. जो सुमिरत सीधी होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोई बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।

जिन्हे स्मरण करने से सब कार्य सिद्ध हो जाते है, जो गुणों के स्वामी और सूंदर हाथी के मुखवाले हैं, वे ही बूढी के राशि और सुभ गुणों के धाम श्री गणेशजी मुझ पर कृपा करे।

2. मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कली मल दहन।

जिनकी कृपा से गूँगा बहुत सूंदर बोलनेवाला हो जाता है और लंगड़ा-लूला दर्गुम पहाड़पर चढ़ जाता है,वे कलयुग के सब पापो को जला डालने वाला दयालु मुझ पर द्रवित हो।

3. नील सरोरुह श्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन।

जो निल कमल के समान श्यामवर्ण हैं, पूर्ण खिले हुए लाल कमल के सामान जिनके नेत्र हैं और जो सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे भगवन नारायण मेरे ह्रदय में निवास करें।

4. कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुणा अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन।

जिनका कुंद के पुष्प और चन्द्रमा के सामान शरीर हैं, जो पार्वतीजी के प्रियतम और दया के धाम हैं और जिनका दिनों पर स्नेह है, वे कामदेव का मर्दन करनेवाले शंकर जी मुझ पर कृपा करे।

5. बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरी।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबी कर निकर।

मैं उन गुरु महाराज के चरण कमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा करके समुन्द्र और नररूप में श्रीहरि ही हैं और जनके वचन महामोहरूपी घने अंधकार के नाश करने के लिये सूर्य-किरणों के समूह हैं।

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