सावन में शिव आराधना का महत्व और उनसे जुड़े कुछ अचूक लाभ

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सावन में शिव आराधना का महत्व और उनसे जुड़े कुछ अचूक लाभ
सावन में शिव आराधना का महत्व और उनसे जुड़े कुछ अचूक लाभ
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यह शिव आराधना का विशेष समय है। सृष्टि की चंद्र प्रकति व्रत के लिए उचित है,जो सेहत के लिए भी लाभदायक हैं। सांख्य शास्त्र के अनुसार प्रकति और पुरुष के मिलन से समस्त प्रकति जाग्रत होती हैं। यह सृष्टि सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन से दो भागो में विभाजीत होती हैं। जब सूर्य उत्तरायण होते है तब सूर्य सृष्टि की प्रकति के और जब दक्षिणायन होते है तब चंद्र होती है। सावन का महीना इसकी शुरुआत और पोष इसका अंत। प्रकति के इस बदलाव की शुरुआत सावन माह से होती हैं। दक्षिणायन का समय भगवान शिव का होता हैं। और उत्तरायण भगवन विष्णु का समय होता हैं।

सावन माह में शिव आराधना का महत्व-

शिव पूर्ण चैतन्य की वर्षा करते है शिव पुराण के अनुसार धातुलिंग पूजा से हजार गुना फल पथर लिंग पूजन से मिलता हैं। पथर लिंग पूजन से हजार गुना फल मृतिका (मिट्टी) लिंग से मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सावन माह में ही समुद्र मंथन किया गया था। मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला। भगवान शंकर ने इस विष को अपने कंठ में उतारकर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की थी। इसलिए इस माह में शिव उपासना से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

जल और बेलपत्र चढ़ाने का महत्व-

भगवान शिव की मूर्ति व शिवलिंग पर जल चढ़ाने का महत्व भी समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा हुआ है। अग्नि के समान विष पीने के बाद शिव का कंठ एकदम नीला पड़ गया था। विष की उष्णता को शांत कर भगवान भोले को शीतलता प्रदान करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पण किया। इसलिए शिव पूजा में जल का विशेष महत्व माना है।भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने केलिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता br से पूछा तो उन्होंने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है। बेलपत्र के विषय में शास्त्रों में बताया गया है कि तीन दलों वाले बेलपत्र को चढ़ाने से तीन जन्मों के पाप नाश हो जाते हैं। बेलपत्र के दर्शन मात्र से ही पाप नाश हो जाते हैं और छूने से सभी प्रकार के शोक, कष्ट दूर हो जाते हैं।

ऐसे करे शिव आराधना-

साधक को नदी के तट,पीपल के पेड़ के नीचे,या शमी वृक्ष के जड़ की चिकनी मिट्टी ‘ॐ हराय नमः‘ बोल के उठानी चाहिए। इस मिट्टी से तर्जनी ऊँगली के बराबर की लम्बाई और अंगूठे के बराबर मोटाई का स्वरूप त्यार करना चाहिए। धातु के पात्र में बेल पत्री के ऊपर मृतिकलिंगेस्वर को स्थापित करे। तीन आचमनी दूध और जल से अभिसेक करवाए। सफेद चंदन, हल्दी, चावल,पुष्प मोली आदि चढ़ाकर मीठे दूध भोग लगाए और ॐ नमः शिवाय का यथाशक्ति जाप करे। इस प्रकार साधना करना ही शिव की सच्ची साधना है।

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