रामचरित्रमानस का बालकांड- प्रथम सोपान

0
249
ramayn
- Advertisement -

प्रथम सोपान:

- Advertisement -

1. बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।
अमिअ मूरिमय चूरन चारु। समन सकल भव रुज परिवारु।

मैं गुरु महाराज के चरण कमलो की राजकी वंदना करता हूँ, जो सुरुचि, सुगंध तथा अनुरागरूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भवरोगों के परिवार को नाश करने वाला है।

2. सुकृति संभु तन बिमल बिभूति। मंजुल मंगल मोद प्रसूति।
जान मन मंजु मुकुर मल हरनी। किए तिलक गुन गन बस करनी।

वह राज सुकृति रूपी शिवजी के शरीर रूप सुशोभित निर्मल विभूति है और सुन्दर कल्याण और आनन्दकी जननी है, भक्त के मनरूपी सुन्दर दर्पण के मैल को दूर करने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश करने वाली है।

3. श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमरित दिब्य द्रष्टि हिय होती।
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।

श्रीगुरु महाराज के चरण-नखो की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही ह्दय में दिव्य उत्पन हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार नाश करने वाला है; वह जिसके ह्दय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य है।

4. उघरहि बिमल बिलोचन ही के। मिटहि दोष दुःख भव रजनी के।
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जह जो जेहि खानिक।

उसके ह्दय में आते ही ह्दय निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्री के दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीरामचरित्र रूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खान में है, सब दिखायी पड़ने लगते है।

5. जथा सुअंजन अंजि द्रग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखल सैल बन भूतल भूरी निधान।

जैसे सिधाजनको नेत्रों में लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनो और पृथ्वीके अंदर कौतुक से ही बहुत-सी खाने देखते हैं।

6. गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ द्र्ग दोष बिभंजन।
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन।

श्रीगुरु महाराज के चरणोंकी रज कोमल और सुंदर नयनामृत-अंजन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला हैं। उस अंजन से विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसाररूपी बंधन से छुडाने वाले श्रीरामचरित्र का वर्णन करता हूँ।

7. बंदउँ प्रथम महिसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउ प्रनाम सप्रेम सुबानी।

पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणो के चरणों की वंदना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन सब संदेहों को हरने वाले हैं। फिर सब गुणों की खान संत- समाज को प्रेमसहित सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूँ।

8. बंदउ प्रथम महिसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउ प्रनाम सप्रेम सुबानी।

पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मण चरणों की वंदना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन सब सन्देहोंको हरने वाले हैं। फिर सब गुणों की खान संत- समाज को प्रेमसहित सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूँ।

9. साधु चरित सुभ चरित कपासू। नीरस बिसद गुणमय फल जासु।
जो सही दुःख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहि जग जस पावा।

संतो का चरित्र कपास के चरित्रके समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। कपास की डोडी नीरस होती है, संत चरित्र में भी विषयसक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है, कपास उज्जवल होता है, संत का ह्दय भी अज्ञान और पापरूपी अंधकार से रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपास में गुण होते है, इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता है, इसलिये वह गुणमय है। जैसे कपास का धागा सुई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों को गोपनीय स्थनोंको ढकता है, उसी प्रकार संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रो को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया हैं।

10. मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।
राम भक्ति जह सुरसरि धारा। सरसइ ब्रहा बिचार प्रचारा।

संतो का समाज आनद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज है। जहाँ रामभक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचारक का प्रचार सरस्वती जी हैं।

11. बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।
हरी हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।

विधि और निषेध रूपी कर्मोंकी कथा कलियुग के पापो को हरने वाली सूर्यतनया यमुनाजी है और भगवान विष्णु और शंकरजी की कथाएँ त्रिवणीरूप से सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनंद और कल्याणो की देने वाली हैं।

12. बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीर्थराज समाज सुकरमा।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।

अपने धर्मो में जो अटल विश्वास है वह अक्षयवट है, और शुभकर्म ही उस तीर्थराज का समाज है। वह सब देशों में, सब समय सभीको सहज ही में प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करने से कलेशो को नष्ट करने वाला हैं।

13. अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सघ फल प्रगट प्रभाऊ।

वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है, एवं तत्काल फल देने वाला है; उसका प्रभाव प्रत्यक्ष हैं।

14. सुनि समुझहि जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहीं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।

जो मनुष्य इस संत-समाजरूपी तीर्थराज का प्रभाव प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यंत प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- चारो और फल पा जाते हैं।

15. मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।
सुनि आचरज करे जनि कोई। सतसंगति महिमा नहीं गोई।

इस तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल ऐसा देखने में आता है कि कौए कोयल बन जाते है और बगुले हंस। यह सुनकर कोई आस्चर्य न करे, क्योकि सत्संगकी महिमा छिपी नहीं है।

16. बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखिन कही निज होनी।
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जिव जहाना।

वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी ने अपने-अपने मुख से अपनी होनी कही हैं। जल में रहने वाले, जमीनपर चलने वाले और आकाश में विचरने वाले नाना प्रकार के जड़- चेतन जितने जिव इस जगत में हैं।

17. मति कीर्ति गति भूति भलाई। जेहि जतन जहाँ जेहिं पाई।
सो जब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।

उनमे से जिसने जिस समय जहाँ कही भी जिस किसी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति और भलाई पायी है, सो सब सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिये। वेदो में और लोक में इनकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है।

18. बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
सत्संग मुद मंगल मूला। सोइ फल सीधी सब साधन फूला।

सत्संग बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज मिलता नहीं। सत्संगति आंनद और कल्याणकी जड़ हैं। सत्संगकी सीधी ही फल है और सब साधन तो फूल है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here